सावन के महीने में बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने की परंपरा, जानिए ज्योतिर्लिंगों से जुड़ा रहस्य

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सावन के महीने में बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने की परंपरा, जानिए ज्योतिर्लिंगों से जुड़ा रहस्य

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Haryana khabar :  अभी शिव जी का प्रिय महीना सावन चल रहा है। इस साल सावन का अधिक मास भी है। ये महीना 31 अगस्त की सुबह करीब 7 बजे तक रहेगा। इसके बाद भाद्रपद मास शुरू होगा। इस कारण 30 अगस्त को ही रक्षा बंधन मनाया जाएगा। सावन में शिव जी के बारह ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और पूजन करने की परंपरा है। जो लोग ज्योतिर्लिंगों के दर्शन नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें अपने घर के आसपास ही किसी शिव मंदिर में द्वादश ज्योतिर्लिंग के मंत्र का जप करते हुए पूजन करना चाहिए।

1.सोमनाथ मंदिर

इस मंदिर की स्थापना चंद्र देव ने की थी। माना जाता है कि इस क्षेत्र में चंद्र देव ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। चंद्र के तप से शिव जी प्रसन्न हुए और यहां प्रकट हुए थे। शिव कृपा से चंद्र की सभी समस्याएं और रोग खत्म हो गए थे।चंद्र देव को वरदान देने के बाद शिव जी यहां ज्योति स्वरूप में विराजित हो गए। चंद्र का एक नाम सोम भी है। इसी नाम पर मंदिर का नाम सोमनाथ पड़ा।

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2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग

माना जाता है कि कार्तिकेय स्वामी शिव जी और माता पार्वती से नाराज होकर श्रीशैल पर्वत पर आ गए थे। इसके बाद से शिव जी और देवी पार्वती समय-समय पर कार्तिकेय से मिलने यहां आते हैं। मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां शिव जी और देवी पार्वती एक साथ ज्योति रूप में विराजित हैं।

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3.महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंगों

ये बारह ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। मंदिर में रोज सुबह होने वाली महाकालेश्वर की भस्म आरती यहां की खासियत है। इस मंदिर में नागचंद्रेश्वर भगवान का मंदिर भी है, जो हर साल सिर्फ एक दिन के लिए नाग पंचमी पर खुलता है। शास्त्रों के मुताबिक, तीन लोक हैं- आकाश, पाताल और मृत्यु लोक। आकाश लोक के स्वामी हैं तारक लिंग, पाताल के स्वामी हैं हाटकेश्वर और मृत्यु लोक के स्वामी हैं महाकाल।

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4.  ऊँकारेशवर  ज्योतिर्लिंग

ये ज्योतिर्लिंग ऊँकार यानी ऊँ की आकृति के पर्वत पर बना हुआ है। इसी वजह से इस मंदिर को ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में राजा मांधाता ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। राजा के तप से शिव जी यहां प्रकट हुए, राजा ने शिव जी से यहां वास करने की प्रार्थना की थी। इसके बाद शिव जी यहां ज्योति स्वरूप में विराजित हो गए।

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5 .केदारनाथ ज्योतिर्लिंग

महाभारत के समय यहां शिव जी ने पांडवों को बेल रूप में दर्शन दिए थे। वर्तमान मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने 8वीं-9वीं सदी में करवाया था। ये मंदिर उत्तराखंड के चार धामों में से एक है। मंदिर समुद्र तल से करीब 3,583 मीटर की ऊंचाई पर है। ये मंदिर हिमालय क्षेत्र में है, इस कारण शीत ऋतु के दिनों में बंद रहता है।

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6.भीमाशंकर  ज्योतिर्लिंग

भीमाशंकर को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। त्रेतायुग से जुड़ी मान्यता है। रावण के भाई कुंभकर्ण का एक पुत्र था भीम। जब श्रीराम ने कुंभकर्ण और रावण का वध कर दिया, तब कुंभकर्ण पुत्र भीम श्रीराम और विष्णु जी को शत्रु मानने लगा था। उसने तप करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और वरदान पाकर देवताओं को पराजित कर दिया। देवताओं और सृष्टि की रक्षा के लिए शिव जी इस क्षेत्र में प्रकट हुए थे और कुंभकर्ण पुत्र भीम का वध कर दिया। इसके बाद देवताओं और भक्तों की प्रार्थना पर शिव जी यहां ज्योति रूप में विराजित हो गए। भीम के नाम पर ही इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमाशंकर पड़ा है।

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7. काशीविश्वनाथ   ज्योतिर्लिंग

यहां महादेव के साथ ही देवी पार्वती भी विराजित हैं। माना जाता है कि इस पौराणिक नगरी की रक्षा स्वयं शिव जी करते हैं। कलियुग के अंत में जब प्रलय आएगा, तब भी काशी विश्वनाथ सुरक्षित रहेगा। विश्वनाथ का अर्थ है पूरे विश्व के स्वामी। यहां देवर्षि नारद के साथ ही अन्य सभी देवी-देवताओं ने भी शिव पूजा की है।

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8.त्र्यंबकेश्वर  ज्योतिर्लिंग

त्र्यंबकेश्वर शिवलिंग में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवता एक साथ विराजित हैं। यहां तीनों देवों की पूजा एक साथ होती है। इस क्षेत्र में गौतम ऋषि ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए तप किया था। गौतम ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी प्रकट हुए थे। तब से ही शिव जी यहां ज्योति स्वरूप में विराजमान हैं।

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9.    बैद्यनाथ   ज्योतिर्लिंग 

रावण से जुड़ी कथा है। रावण ने हिमालय क्षेत्र में शिवलिंग बनाकर तप किया था। तप से शिव जी प्रसन्न होकर प्रकट हुए। रावण ने अपनी इच्छा बताई कि वह ये शिवलिंग लंका में स्थापित करना चाहता है। शिव जी ने रावण की इच्छा पूरी होने का वरदान दिया, लेकिन ये भी कहा कि रास्ते में तुम ये शिवलिंग जहां रख दोगे, शिवलिंग वहीं स्थापित हो जाएगा।

रावण शिवलिंग उठाकर लंका ले जा रहा था, तभी रास्ते में उसने गलती से शिवलिंग नीचे रख दिया, इसके बाद शिवलिंग वहीं स्थापित हो गया। ये शिवलिंग बैद्यनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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10. बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग 

शिवपुराण की रुद्र संहिता में शिव जी को नागेशं दारुकावने कहा है। नागेश्वर का अर्थ है नागों के ईश्वर। मंदिर की मान्यताएं पांडवों से भी जुड़ी हैं। माना जाता है कि इस क्षेत्र में शिव जी ने दारुक नाम के दैत्य का वध किया था।

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11.  रामेश्वरम    ज्योतिर्लिंग 

श्रीराम रावण वध के बाद लंका से अयोध्या जा रहे थे। उस समय श्रीराम लंका से समुद्र पार करके दक्षिण भारत में समुद्र किनारे पहुंचे और उन्होंने यहां बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा की थी। बाद में यही बालू का शिवलिंग वज्र के समान हो गया। श्रीराम ने इस शिवलिंग का निर्माण किया था। इस वजह से इस शिवलिंग को रामेश्वरम कहा जाता है।

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12. घुश्मेश्वर  ज्योतिर्लिंग 

पौराणिक कथा है कि एक ब्राह्मण सुधर्मा की पत्नी सुदेहा थी। इनकी कोई संतान नहीं थी। इसलिए सुदेहा ने अपनी छोटी बहन घुश्मा का विवाह अपने पति सुधर्मा से करवा दिया। घुश्मा शिव जी की परम भक्त थी। विवाह के बाद उसे पुत्र की प्राप्ति हुई। अपनी बहन के यहां पुत्र होने से सुदेहा घुश्मा से जलने लगी थी।

जलन की वजह से एक दिन सुदेहा ने अपनी बहन के बेटे की हत्या कर दी और एक कुंड में बेटे का शव डाल दिया। जब ये बात घुश्मा को मालूम हुई तो वह दुखी हुए बिना शिव पूजा करने लगी। शिव जी उसकी पूजा से प्रसन्न हुए और प्रकट हुए। शिव जी ने घुश्मा के पुत्र को जीवित कर दिया। घुश्मा ने शिव जी से प्रार्थना की थी कि अब से वे यहीं विराजमान रहें। भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए शिव जी यहां ज्योति रूप में विराजित हो गए। घुश्मा के नाम पर ही मंदिर का नाम घुश्मेश्वर पड़ा।

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